मानस पूजा स्तोत्र – भाव से की गई भगवान शिव की मानसिक पूजा
"श्रद्धा और समर्पण हो तो मन ही बन जाता है मंदिर!" हमारे शास्त्रों में ऐसी कई स्तुतियाँ हैं जो यह बताती हैं कि जब संसाधन न हों, तब भी केवल मन की शक्ति से भगवान की पूजा की जा सकती है। ऐसी ही एक अनुपम स्तुति है — "मानस पूजा स्तोत्र" , जो भगवान शंकर को समर्पित है। यह स्तोत्र हमें यह सिखाता है कि बाहरी वस्तुओं से अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक भाव, श्रद्धा और समर्पण। प्रस्तुत हैं इसके श्लोक और भावार्थ: 🪔 श्लोक १ – पूजन सामग्री की मन से अर्पणा रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम् । जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥१॥ भावार्थ: हे दयानिधि पशुपति! मैंने मन में रत्नजड़ित आसन, हिमालय जल से स्नान, दिव्य वस्त्र, रत्नों से अलंकृत चंदन, चंपा-जाती-बिल्व पत्र के पुष्प, धूप और दीप की कल्पना की है। कृपया हृदय से अर्पित मेरी यह पूजा स्वीकार करें। 🍚 श्लोक २ – नैवेद्य की भावना सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।...